ऋतुराज दुबे, संपादक, द फोर्थ डाइमेंशन
विशाल नामदेव, विदेश प्रमुख,उप संपादक
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की हालिया भारत यात्रा भारत–कनाडा संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देती है। यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक पुनर्संतुलन की दिशा में एक निर्णायक कदम थी।
पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में खालिस्तानी अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर कनाडा द्वारा लगाए गए आरोपों के कारण संबंधों में गंभीर तनाव उत्पन्न हुआ था, जिसे भारत ने सख्ती से खारिज किया था। इस विवाद ने CEPA सहित कई वार्ताओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
प्रधानमंत्री कार्नी की यात्रा ने इन संबंधों को पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस संकेत दिए हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और कनाडा के संबंध स्वतंत्रता के बाद से ही स्थापित रहे हैं। दोनों राष्ट्र राष्ट्रमंडल (Commonwealth) के सदस्य हैं।
हालाँकि, 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण “ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा” के बाद पश्चिमी देशों, विशेषकर कनाडा ने प्रतिबंध लगाए।
1998 में “ऑपरेशन शक्ति (पोखरण-II)” के बाद भी प्रतिबंधों का दौर देखने को मिला।
123 समझौता और वैश्विक एकीकरण
2005 में भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने भारत को वैश्विक परमाणु व्यापार में प्रवेश दिलाया। NSG छूट के बाद कनाडा जैसे देशों के साथ परमाणु सहयोग संभव हुआ।
कनाडा विश्व का दूसरा सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रमुख समझौते
2.6 अरब डॉलर का दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता
CEPA वार्ता पुनः आरंभ
क्रिटिकल मिनरल्स सहयोग
नवीकरणीय ऊर्जा MoU
AICTE–Mitacs छात्र विनिमय कार्यक्रम
इंडो-पैसिफिक छात्रवृत्ति
स्पेस सहयोग (ISRO–Canadian Space Agency)
पल्स प्रोटीन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
हाइड्रोजन अनुसंधान सहयोग
आर्थिक परिदृश्य
द्विपक्षीय व्यापार: ₹1.2 लाख करोड़
भारत का निर्यात: ₹72,000 करोड़
कनाडाई निवेश: ₹8 लाख करोड़ (100 बिलियन डॉलर)
निष्कर्ष
भारत–कनाडा संबंध केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं हैं। यह इंडो-पैसिफिक रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और लोकतांत्रिक साझेदारी की व्यापक रणनीतिक तस्वीर का हिस्सा हैं।
प्रधानमंत्री कार्नी की यह यात्रा भविष्य के लिए एक स्थिर, व्यवहारिक और रणनीतिक मार्ग प्रशस्त करती है।